Bevkoofi Ka Saundarya
Bewkoofi Ka Saundarya
अनूप शुक्ल के धारदार व्यंग्य संग्रहों से सजी पुस्तक "बेवकूफ़ी का सौंदर्य" हमारी निर्मल आनंद की सोच को आगे बढाती है। हम जिन बातो को साधारण मानकर नज़र अंदाज़ कर देते है अनूप शुक्ल उनमे भी हास्य ख़ोज लेते हैं। हिंदी साहित्य में एक अच्छे व्यंग्य संग्रह की जो एक कमी लम्बे समय से है ये पुस्तक उसे पूरा करने का प्रयास अवश्य करती हैं।
प्रथम संस्करण
पेपरबैक
संभावित डिलीवरी - 3-5 दिन
Corporate Panchtantra
Dhanak – 3
Dhanak – 4
Fragile Rishtey
Ghumakkadi Ki Dihadi
Joote Ki EMI
आलोक को व्यंग्य के सौंदर्यशास्त्र और उसके व्याकरण की इतनी गहरी, नैसर्गिक सी समझ है कि उनको पढकर, और व्यंग्य लेखन को लेकर उनकी इस जिद और बेचैनी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। स्वयं के लिखे पर उनका अगाध भरोसा, और निरंतर कुछ नया करने की अहर्निश बेचैनी ही उनको सारे समकालीनों से अलग करती है। उनकी यही बेचैनी, और नये प्रयोग करने का साहस मुझे उनका प्रशंसक बनाता है।
उन्होंने लंबी रचनाएं भी लिखी हैं, कथात्मक व्यंग्य भी लिखे हैं और व्यंग्य में पगे निबंध भी खूब लिखे हैं। पर उनकी बदनामी और ख्याति उन एकदम छोटी, एकदम तात्कालिक घटनाओं पर तात्कालिक घटनाओं पर तात्कालिक व्यंग्यात्मक, आशु कवि की तरह, तुरंत रचे अर्थपूर्ण वनलाइनर अर्थात जुमलों के लिए है। मेरा मानना है कि जुमलेबाजी करना बेहद प्रतिभा मांगता है। आसान काम नहीं होता यह, जैसा कि पहली नजर में किसी को लगता होगा। जब तक व्यंग्य की कहन पर आपकी वैसी पकड़ न हो जैसी आलोक की है, तब तक आप मात्र एक दो वाक्य में वह चमत्कार पैदा नहीं कर सकते जो व्यंग्य भी हो, और जिसमें मात्र एक पंक्ति में ही कोई बहुत बड़ी बात भी कह दी गई हो। इसके लिये आपको समकालीन समाज, राजनीति, अर्थशास्त्र, बाजार और सारी दुनिया पर गहरी पकड़ तो चाहिये ही, साथ में व्यंग्य रचने का अद्भुत कौशल भी चाहिये।
डा. ज्ञान चतुर्वेदी, वरिष्ठ व्यंग्यकार और उपन्यासकार,