आरंभ प्रचंड भी हो सकता था पर हमने सरल चुना। इस चुनाव के पीछे मंशा चकाचौंध से बचने की नहीं रही बल्कि आरंभ को सरल ही रखने की चाह रही। मंच पर खड़े होने की बजाय हमने भीड़ में ही अपने लिए एक कोना चुना। जहां हम लोगो के बीच शामिल होकर उन तक अपनी बात पहुचाए। जो लोग साहित्य में रुचि रखते है और पढ़ने का जिनहे शौक है वो तो हमे खोज कर पहुच ही जाएँगे मगर हम उन तक भी पहुचना चाहते है जो हमसे मिल नहीं पा रहे है और इसी क्रम में आज हम उपस्थित है आपके साथ अपनी वेबसाइट लेकर.. उम्मीद है आपका प्यार ज़रूर मिलेगा

 

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1 Comment on "आरंभ है सरल"

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वंदना अवस्थी दुबे
Guest

बहुत पहले, आरती, बिजली, सरस्वती या हंस के समय पुस्तक प्रकाशन का काम केवल लेखक किया करते थे। फिर प्रकाशन का काम व्यावसायिक हो गया और तमाम बड़े व्यवसायी इस क्षेत्र में उतर आये। लेखक अपनी किताब को छपवाने का जरिया मात्र बन गया। लेकिन लगता है कि समय का पहिया घूम के फिर यथास्थान पहुँच गया है। लेखक फिर प्रकाशक की भूमिका में है। पढ़ने को बेहतर से बेहतरीन पुस्तकें मिलेंगी, ऐसी केवल उम्मीद नहीं, विश्वास भी है। बधाइयां।

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